बीपीओ जी. राम जी योजना शुरू होने से पहले सरकार को प्रधानों का बड़ा झटका!

सीमांत ज्योतिर्मठ में बहिष्कार की चेतावनी, बोले- पहले समस्याएं सुलझाइए, फिर योजना लागू कीजिए
ज्योतिर्मठ।
उत्तराखंड सरकार सीमांत क्षेत्रों में बीपीओ जी. राम जी योजना को प्रभावी ढंग से लागू करने की तैयारी में है, लेकिन योजना पूरी तरह धरातल पर उतरने से पहले ही चमोली के सीमांत विकासखंड ज्योतिर्मठ से सरकार को बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक झटका लगा है। विकासखंड के ग्राम प्रधानों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक वर्षों से लंबित समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तब तक योजना का संचालन आसान नहीं होगा।
प्रधान संगठन ने सात सूत्रीय मांगपत्र के साथ सरकार को अल्टीमेटम देते हुए साफ कहा है कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो ग्रामवासी योजना के तहत कार्य नहीं करेंगे और पूरे क्षेत्र में आंदोलन छेड़ा जाएगा।
डिजिटल व्यवस्था, लेकिन इंटरनेट गायब सरकार ग्रामीण विकास योजनाओं को डिजिटल माध्यम से संचालित करने पर जोर दे रही है, जबकि ज्योतिर्मठ के 58 गांवों में आज भी इंटरनेट सुविधा नहीं है। कई गांवों में मोबाइल पर केवल कॉलिंग नेटवर्क उपलब्ध है। ऐसे में ऑनलाइन उपस्थिति, फेस ऑथेंटिकेशन और अन्य प्रक्रियाएं केवल कागजों तक सीमित नजर आती हैं।
प्रधानों का सवाल है कि जहां इंटरनेट ही नहीं पहुंचा, वहां ऑनलाइन व्यवस्था कैसे सफल होगी? उन्होंने इंटरनेट उपलब्ध होने तक सभी कार्य ऑफलाइन कराने की मांग की है। चार साल से अटका भुगतान, टूट रहा भरोसा
प्रधान संगठन का सबसे गंभीर आरोप चार वर्षों से लंबित मटेरियल भुगतान और रोजगार सेवकों के वेतन को लेकर है। उनका कहना है कि दुकानदार अब उधार में सामान देने को तैयार नहीं हैं। रोजगार सेवकों का मानदेय भी वर्षों से नहीं मिला। ऐसे में पंचायतें विकास कार्य कैसे आगे बढ़ाएं?यह केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं के प्रति लोगों के भरोसे का भी सवाल बनता जा रहा है।
सीमांत की चुनौती, मैदानी नियम
ज्योतिर्मठ की भौगोलिक परिस्थितियां मैदानी क्षेत्रों से पूरी तरह अलग हैं। कई गांवों तक निर्माण सामग्री घोड़े-खच्चरों से पहुंचानी पड़ती है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कम ऑक्सीजन और कठिन चढ़ाई के बीच काम करना आसान नहीं होता।
प्रधानों का कहना है कि जब परिस्थितियां अलग हैं तो मजदूरी दर, स्टीमेट कॉस्ट और कार्य प्रणाली भी अलग होनी चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने मजदूरी 700 रुपये प्रतिदिन, मिस्त्री की मजदूरी 1000 रुपये और रोजगार 200 दिन करने की मांग उठाई है।
सवाल जो जवाब चाहते हैं
क्या बिना इंटरनेट वाले गांवों में डिजिटल व्यवस्था लागू करना व्यावहारिक है? चार वर्षों से लंबित भुगतान के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या सीमांत क्षेत्रों के लिए अलग नीति और अलग वित्तीय प्रावधान की जरूरत नहीं है? क्या सरकार योजना लागू करने से पहले जमीनी चुनौतियों का समाधान करेगी? ज्योतिर्मठ के प्रधानों का यह अल्टीमेटम केवल एक ज्ञापन नहीं, बल्कि सीमांत क्षेत्रों की उन समस्याओं की आवाज है, जो वर्षों से समाधान की प्रतीक्षा कर रही हैं। अब निगाहें सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।



