11 दिन तक जिंदगी और मौत से जूझता रहा मासूम, डॉक्टरों की मेहनत और सही इलाज से लौटी घर की खुशियां

माँ के दूध का कोई विकल्प नहीं: बोतल से दूध पिलाने से गंभीर रूप से बीमार हुआ नवजात, बेस अस्पताल श्रीनगर ने बचाई जान
जोशीमठ और गोपेश्वर अस्पताल के बाद बेस अस्पताल में मिला उचित उपचार
श्रीनगर गढ़वाल –
माँ का दूध नवजात शिशु के लिए अमृत समान माना जाता है, लेकिन कई बार जानकारी के अभाव में लिए गए छोटे-से फैसले गंभीर परिणाम दे सकते हैं। ऐसा ही एक मामला चमोली जनपद के जोशीमठ क्षेत्र से सामने आया, जहां एक माह का नवजात शिशु बोतल से दूध पिलाने के कारण गंभीर रूप से बीमार हो गया। हालत इतनी बिगड़ गई कि बच्चे को चमोली के अस्पतालों से होते हुए अंततः हेमवती नंदन बहुगुणा बेस चिकित्सालय श्रीनगर लाना पड़ा। यहां बाल रोग विशेषज्ञों और नर्सिंग स्टाफ की अथक मेहनत से 11 दिनों तक चले उपचार के बाद मासूम पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने माता-पिता के साथ घर लौट सका।
बाल रोग विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अशोक शर्मा ने बताया कि जोशीमठ के कमद गांव निवासी संजय और गौरी देवी का एक माह का शिशु लगातार बीमार चल रहा था। जानकारी के अभाव में बच्चे को मां के दूध के स्थान पर बोतल से दूध पिलाया जाने लगा, जिससे उसे गंभीर संक्रमण और पेचिश की समस्या हो गई। लगातार दस्त होने के कारण उसके शरीर में पानी की भारी कमी हो गई और स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ने लगा। उन्होंने बताया कि बच्चे का उपचार पहले जोशीमठ और फिर गोपेश्वर अस्पताल में किया गया, लेकिन स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। हालत गंभीर होने पर चिकित्सकों ने बेस चिकित्सालय श्रीनगर से संपर्क कर बच्चे को रेफर किया। जब नवजात श्रीनगर पहुंचा तब उसकी स्थिति बेहद नाजुक थी।
दिमाग में सूजन, किडनी ने काम करना कम कर दिया था–
डॉ. अशोक शर्मा ने बताया कि बच्चे की किडनी ने काम करना कम कर दिया था, आंतों की कार्यप्रणाली रुक गई थी और पेट फूल गया था। ये सभी स्थितियां शरीर में पानी और आवश्यक लवणों की अत्यधिक कमी (डिहाइड्रेशन) के कारण उत्पन्न हुई थीं। इस स्थिति में शरीर के सभी अंग-तंत्र, विशेष रूप से मस्तिष्क, हृदय, फेफड़े और किडनी की कार्यप्रणालियां प्रभावित होकर विफल होने लगती हैं। ऐसे मामलों में समय रहते गहन एवं जटिल उपचार तथा लगातार निगरानी (क्लोज मॉनिटरिंग) की जाए, तभी मरीज का जीवन बचाया जा सकता है। डा शर्मा ने बताया कि वह स्वास्थ्य जागरूकता एवं सामाजिक स्वास्थ्य शिक्षा के माध्यम से लोगों के स्वास्थ्य में सुधार लाने के मिशन पर कार्य कर रहे हैं। विशेष रूप से स्तनपान (ब्रेस्टफीडिंग) को बढ़ावा देना उनका प्रमुख लक्ष्य है।
समन्वय और टीमवर्क से मिली सफलता-
चिकित्सक डॉ. सर्वजीत कौर ने बताया कि गोपेश्वर अस्पताल की चिकित्सक डॉ. मीनाक्षी ने समय रहते बच्चे की स्थिति की जानकारी साझा कर समन्वय स्थापित किया, जिससे बेस अस्पताल की टीम उपचार के लिए पहले से तैयार हो सकी। इसी का परिणाम रहा कि बच्चे को समय पर सही उपचार मिल पाया। उपचार में डॉ. मेहरा विरोथिया, डॉ. दानीश सहित नर्सिंग स्टाफ नेहा रावत, बीना, अनिल, धीरा पुंडीर, अनिता और बीना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
स्तनपान है नवजात के लिए सबसे सुरक्षित और सर्वोत्तम आहार–
डॉ. अशोक शर्मा ने कहा कि नवजात शिशु के लिए मां का दूध सबसे सुरक्षित, पौष्टिक और संपूर्ण आहार है। इससे बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, संक्रमण का खतरा कम होता है तथा उसके शारीरिक और मानसिक विकास में मदद मिलती है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी कारणवश मां का दूध पर्याप्त मात्रा में नहीं बन रहा हो या स्तनपान कराने में कोई समस्या हो तो परिवार को स्वयं निर्णय लेने के बजाय चिकित्सक या विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए। सुनी-सुनाई बातों या गलत जानकारी के आधार पर नवजात को बोतल से दूध पिलाना कई बार गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है।
समाज के लिए सीख-
चिकित्सकों ने इस घटना को पूरे समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश बताते हुए कहा कि नवजात शिशुओं की देखभाल में लापरवाही या गलत जानकारी जानलेवा साबित हो सकती है। समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना, स्तनपान को प्राथमिकता देना और स्वास्थ्य सेवाओं का सही उपयोग करना हर माता-पिता की जिम्मेदारी है।
भावुक हुए माता-पिता, जताया आभार – बच्चे के स्वस्थ होने पर उसके पिता संजय और माता गौरी देवी ने बेस चिकित्सालय श्रीनगर के चिकित्सकों और स्टाफ का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि बच्चे की बिगड़ती हालत देखकर पूरा परिवार घबरा गया था और उम्मीदें टूटने लगी थीं, लेकिन बेस अस्पताल के डॉक्टरों ने दिन-रात मेहनत कर उनके मासूम को नया जीवन दिया है।
उन्होंने कहा कि अस्पताल से स्वस्थ होकर बच्चे के घर लौटने से उनके परिवार की खुशियां वापस आ गई हैं और वे इसके लिए पूरी चिकित्सा टीम के सदैव ऋणी रहेंगे।



