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अब नही होगा बद्री विशाल के शुभाकंर का कोई चिन्ह

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गोपेश्वर।

बदरीनाथ मंदिर के ’शुभाकंर’ की परंपरा भी अब नेपथ्य में चली गई है। इसके चलते भारत के सभी राज्यों के लोगों को बदरीनाथ धाम से जोड़ने की कवायद भी हासिए पर चले गई है।

दरअसल वर्ष 2012 से श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) ने देश के सभी राज्यों का प्रतिवर्ष बारी-बारी से बदरीनाथ मंदिर के सिंहद्वार पर शुभांकर लगाने की अनूठी पहल शुरू की थी। यह शुभांकर राज्यों के नाम के वर्णमाला क्रम के अनुसार लगाने का प्रावधान किया गया था। वर्ष 2012 से शुरू हुई इस अभिनव पहल के तहत उत्तराखंड राज्य के माल्यार्पण करते हाथी को शुभांकर के रूप में सिंहद्वार पर लगाया गया था। इसके बाद वर्ष 2013 में पैतृक उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद महाकुंभ के संचालित होने के चलते उत्तर प्रदेश का कुंभ अमृत कलश नाम का शुभांकर लगाया गया था।

वर्ष 2013 की आपदा के बाद यात्रा के अव्यवस्थित हो जाने के कारण वर्ष 2014 में किसी भी प्रदेश का शुभांकर नहीं लगाया जा सका था। वर्ष 2015 में जब यात्रा पटरी पर लौटने लगी तो हिमाचल प्रदेश के स्वास्तिक चिन्ह को शुभांकर के रूप में लगाया गया था। इसी तरह वर्ष 2016 में भी इसी तरह एक अन्य राज्य का शुभांकर लगाया गया। वर्ष 2017 में महाराष्ट्र राज्य का शुभांकर आकर्षण का केंद्र रहा। वर्ष 2018 में गुजरात राज्य का शुभांकर श्री बदरीनाथ मंदिर के सिंहद्वार पर लगाया गया।

वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव के लिए आदर्श आचार संहिता लगी रहने के कारण शुभांकर का नाम आने वाले राज्य को मौका नहीं मिल पाया। इसके चलते सिंहद्वार का शुभांकर वाला स्थान खाली न रहे इसके लिए उगता हुआ सूरज नामक अपना शुभांकर ही बदरीनाथ में बीकेटीसी ने लगाया था। इस तरह 2019 में उगता सूरज शुभांकर ही बदरीनाथ मंदिर के सिंहद्वार का आकर्षण रहा। वर्ष 2020 तथा 2021 में कोराना महामारी के चलते शुभाकंर लगाने की कवायद ठहर सी गई। 2022 में उत्तराखंड विधानसभा के चुनाव हुए तो इस दौरान भी शुभाकंर लगाने की परंपरा आगे नहीं बढ पाई। 2023 में भी इस पर कोई पहल नहीं की गई। 2024 में लोकसभा के चुनाव के दौरान भी शुभाकंर लगाने का मामला लटका रहा। 2025 में इस मामले में कोई पहल नहीं हो पाई। अब जबकि इस साल 23 अप्रैल को खुल चुके हैं किंतु किसी राज्य का शुभाकंर बदरीनाथ मंदिर के सिंहद्वार पर नहीं लग सका।

बताते चलें कि बदरीनाथ धाम से धाम से भावनात्मक रूप सभी राज्यों को बदरीनाथ भगवान से जोड़े रखने के लिए ही सभी राज्यों का देश के इस प्रमुख घाम के प्रति लगाव बढ़ाने के लिए यह पहल अमल में लाई गई थी। तब राज्यों से यह भी अपेक्षा की गई थी कि राज्य अपने लोगों को इन धामों की ओर प्रेरित कर इस यात्रा के लिए हज की तर्ज पर उन्हें पैकेज सुविधा भी उपलब्ध कराएंगे ताकि लोगों की धर्म के प्रति आस्था बढ़े और सामाजिक विकृतियों का प्रतिकार कर लोग अध्यात्म की ओर अग्रसर हो सके।

इससे देश में धार्मिक आस्था का वातावरण भी तैयार होगा और तमाम व्यभिचारों को त्याग कर लोग धर्म की और उन्मुख हो सकेंगे। इस तरह की परंपरा डालने के पीछे यह भी मंशा रही कि देशवासियों में अपने ईष्ट देव का सा भाव जागृत होगा और भगवान बदरीनाथ तथा केदारनाथ के प्रति देशवासी इन धामों की ओर आकृष्ट होंगे।

बदरीनाथ मंदिर के सिंहद्वार पर शुभाकंर लगाने की यह पहल अब हासिए पर चले गई है। इससे देश के सभी राज्यों को बदरीनाथ धाम से जोड़ने की कवायद को धक्का भी लगा है। वैसे आदिगुरू शंकराचार्य ने धार्मिक तौर पर देशवासियों को एक सूत्र में जोड़ने के लिए देश के चारधामों में चार पीठों की स्थापना की थी। इसमें उत्तराखंड में ज्योतिष्पीठ भी ज्योतिर्मठ में स्थित है। बदरीनाथ धाम भी इसी पीठ में स्थित है। कहा जा सकता है कि उत्तर भारत का यह क्षेत्र ज्योतिष्पीठ के अधीन ही पड़ता है। बीकेटीसी सभी राज्यों को बदरीनाथ धाम से जोड़ने की यह कवायद अब गुजरे जमाने की सी बात हो गई है। अब देखना यह है कि बदरीनाथ मंदिर की व्यवस्था का संचालन कर रही बीकेटीसी इस कवायद को आगे बढ़ाती है कि नहीं यह सब भविष्य के गर्भ में है।

यह लेख बरिष्ठ पत्रकार श्री राजपाल बिष्ट जी की कलम से लिखी गयी है

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