112 साल बाद मिला सम्मान, प्रथम विश्व युद्ध के बीर बहादुर के परिजनों को


दिलवर सिंह बिष्ट/ रुद्रप्रयाग-
जनपद रुद्रप्रयाग के ग्राम फलई पोस्ट अज्ञस्त्यमुनि तहसील बसुकेदार निवासी वीर सपूत राइफलमैन स्व. बहादुर सिंह रावत की शौर्यगाथा करीब 112 वर्ष बाद फिर से ग्रामीणों के सम्मुख आई है। प्रथम विश्व युद्ध में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले इस वीर सैनिक के साहस और त्याग पर उनके गांव से लेकर जिले के लोग गर्व महसूस कर रहा है। पूर्व में यह क्षेत्र चमोली जनपद का हिस्सा हुआ करता था आज रुद्रप्रयाग जिले का हिस्सा है।बता दें की आर्मी न. 599 स्व. बहादुर सिंह रावत का जन्म वर्ष 1880 में स्व .खंतडू सिंह रावत के परिवार में ग्राम -फलई तल्ला कालीफाट पोस्ट अगस्त्यमुनि , तहसील -बासुकेदार ,जिला -रुद्रप्रयाग में हुआ था। स्व. श्री बहादुर सिंह रावत अपने नाम के अनुरूप ही निडर ,साहसी व जोशीले थे अपने इसी गुण के कारण 26 अक्टूबर 1901 को 2/ 39 रॉयल गढ़वाल राइफल में 21 वर्ष की आयु में भर्ती हुए । जुलाई 1914 में प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ जिसमें अक्टूबर 1914 में अपने बेस लैंसडाउन से 2 / 39 रॉयल गढ़वाल राइफल्स के जवानों को फ्रांस के लिए भेजा गया था जिन में विक्टोरिया क्रॉस प्राप्त गब्बर सिंह नेगी के साथ स्व. बहादुर सिंह रावत भी युद्ध में सम्मिलित होने के लिए फ्रांस गए थे। 7 नवंबर 1914 को प्रथम यप्रेस की लड़ाई में इन्होंने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था सरकार द्वारा इन्हें मेडल (डेथ मैन पैनी)प्रदान किया गया था जिसपे लिखा हुआ है “HE DIED FOR FREEDOM AND HONOUR”.उस समय जागरूकता के अभाव में इनके बलिदान के अनुरूप प्रसिद्धि नहीं मिल पाई । फलई निवासी सुभाष नेगी ने बताया की वर्तमान समय में लगभग 112 साल बाद इस मेडल के आधार पर आर्मी रिकॉर्ड से पता करने के पश्चात पर्याप्त मात्रा में साक्ष्य प्राप्त हुए जिसमें लैंसडाउन वॉर मेमोरियल में गब्बर सिंह जी की मूर्ति के पीछे बने वार मेमोरियल में इनका नाम दर्ज है दिल्ली के इंडिया गेट व फ्रांस के न्यू चैपल में बने इंडियन मेमोरियल में भी इनका नाम अंकित है। इनके इतिहास और बलिदान की गाथा को सुनकर आज जनपद रुद्रप्रयाग, स्व. बहादुर सिंह रावत के अदम्य साहस और बहादुरी की पराकाष्ठा पर खुद को गर्वित महसूस कर रही है । लैंसडाउन छावनी स्टेशन कमांडर ब्रिगेडियर विनोद सिंह नेगी द्वारा उनके परिजनों सम्मानित किया गया।



