पहाड़ की पीड़ा: सड़क नहीं, डंडी-कंडी ही सहारा

शहीद की 75 वर्षीय मां को पांच किलोमीटर पैदल ढोकर सड़क तक लाए ग्रामीण, स्वास्थ्य व्यवस्था पर फिर उठे सवाल
रमेश चंद्र थपलियाल/चमोली
सरकार भले ही प्रदेश के अंतिम गांव तक सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के दावे कर रही हो, लेकिन चमोली जिले की निजमूला घाटी की हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती है। मंगलवार को सड़क के अभाव में ग्रामीणों को 75 वर्षीय गंभीर रूप से बीमार महिला को डंडी-कंडी के सहारे पांच किलोमीटर ऊबड़-खाबड़ और जोखिम भरे पैदल रास्ते से सड़क तक पहुंचाना पड़ा। यह महिला कोई और नहीं, बल्कि देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले शहीद रघुवीर सिंह की माता पार्वती देवी हैं।
निजमूला घाटी के दूरस्थ भनाली गांव निवासी पार्वती देवी की तबीयत अचानक बिगड़ गई। गांव में न सड़क है और न ही तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध। ऐसे में ग्रामीणों के सामने उन्हें किसी भी तरह अस्पताल तक पहुंचाने की चुनौती थी। गांव के लोगों ने डंडी-कंडी तैयार की और उफनते गदेरों, टूटे रास्तों तथा घने जंगलों के बीच करीब पांच किलोमीटर पैदल चलकर उन्हें जुलबगढ़ मोटर मार्ग तक पहुंचाया। इसके बाद वाहन से उन्हें जिला चिकित्सालय गोपेश्वर ले जाया गया।
बीमार महिला को सड़क तक पहुंचाने में उनके पुत्र जसपाल सिंह के साथ ग्रामीण नरेंद्र सिंह, आषाढ़ सिंह, कर्ण सिंह, गंगा सिंह, देव सिंह और गजेंद्र सिंह सहित कई ग्रामीणों ने घंटों तक कठिन संघर्ष किया। रास्ते की दुर्गमता के कारण पार्वती देवी की हालत लगातार बिगड़ती रही, लेकिन गांव के लोगों के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था।
ग्रामीण नरेंद्र सिंह का कहना है कि वर्षों से भनाली गांव तक सड़क निर्माण की मांग की जा रही है, लेकिन आजादी के करीब आठ दशक और उत्तराखंड राज्य गठन के 26 वर्ष बाद भी गांव सड़क सुविधा से वंचित है। उनका कहना है कि केवल भनाली ही नहीं, बल्कि निजमूला घाटी के कई गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सड़क और स्वास्थ्य व्यवस्था आज भी ग्रामीणों के लिए सरकार नहीं, बल्कि भगवान भरोसे है।
वर्षों से अधूरा पुल, हर बरसात में बढ़ जाती है मुश्किल——
निजमूला घाटी में सड़क संपर्क की समस्या को एक निर्माणाधीन पुल भी और गंभीर बना रहा है। ग्रामीणों के अनुसार, वर्षों पहले शुरू हुआ पुल आज तक पूरा नहीं हो पाया है। बरसात के दिनों में उफनते गदेरे और क्षतिग्रस्त पैदल मार्ग ग्रामीणों के लिए जानलेवा साबित होते हैं। बीमार, घायल और गर्भवती महिलाओं को आज भी डंडी-कंडी के सहारे सड़क तक लाना मजबूरी बनी हुई है।
नेताओं का क्षेत्र, फिर भी विकास से दूर——-
विडंबना यह है कि निजमूला घाटी सत्ता और विपक्ष के कई प्रभावशाली नेताओं का क्षेत्र रही है, लेकिन इसके बावजूद दूरस्थ गांव आज भी सड़क जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित हैं। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय विकास के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही गांव फिर उपेक्षा का शिकार हो जाते हैं।
सिर्फ निजमूला ही नहीं, पूरे जिले की यही तस्वीर——-
चमोली जिले के डुमक, देवाल और अन्य दुर्गम क्षेत्रों में भी सड़क सुविधा का अभाव ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। कई गांवों में आज भी गंभीर मरीजों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को पालकी या डंडी-कंडी के सहारे अस्पताल पहुंचाना पड़ता है। ग्रामीण रघुवीर सिंह और राजेंद्र सिंह बताते हैं कि सड़क न होने के कारण समय पर उपचार नहीं मिल पाता और कई बार मरीजों की जान तक खतरे में पड़ जाती है। पहाड़ के इन गांवों की यह तस्वीर एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि आखिर विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की यह दूरी कब खत्म होगी।



